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देखा है कभी?

शाम को कभी छत पे बैठ कर
नीले आसमान को काला होते देखा है?

एक तरफ सूरज को ढलते तो दूसरी तरफ चाँद को बनते देखा है?

कुछ तारो का जल्दी आना,
पंछी ओ का अपने घर जाना कभी देखा है?

शाम की बेहति हवा में कभी पेड को नाचते देखा है?

देखा है किस तरह से रात गेहरी होती जाती है?
देखा है किस तरह रात तारो को जगह देती जाती है?

देखा है किस तरह सूरज छुपा लेता है अपनी रौशनी दूसरी तरफ,
देखा है किस तरह चाँद सूरज से रौशनी उधार लेकर हमे थोड़ी ही सही पर रौशनी तो देता है।

जब चाँद भी नहीं होता आसमान में तब जुगनुओं को जलते बुझते देखा है?

देखा है किस तरह तारे चाँद की कमी पूरी करते है?
रौशनी ना सही पर रास्ता चुन ने में मदद करते है।

ऐसी बहुत सी चीज़े है जो हम देख कर अनदेखा कर देते है,
बस गुज़रते रेहते है लम्हो के साथ कभी उसमे जांख कर नहीं देखते है,

तो रुको, ठेहरो और देखो हर पल में बहुत कुछ बीत रहा है,
ऐसे ही मत जाने दो लम्हो को उसमे एक कारवाँ सा बसा है।

तुम्हारी इकलौती ज़िन्दगि तुम्हारे सारे लम्हो को ,सारे पलो को समेट लेगी एक दिन,
उस से पेहले तुम उनमे से ही किसी पल में अपनी ज़िन्दगि देख लो, क्युकी ज़िन्दगी युतो हमें हररोज़ काफी मौके देती है पर एक दिन हमसे सारे आने वाले पल छीन लेती है

इसी लिए रुको, ठहरो और देखो हर पल को, क्युकी ज़िन्दगी जाने कब वो पल लेकर आ जाए जिसमे तुम चाह कर भी ठहर नहीं सकोगे.

– Udit Rathod


Hey Hi if you liked this poem then please share with others (that’s means a lot to me). Thanks in advance 🙂

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It’s ok to fail yaar… but?

…Aur pyaar “ढूँढा” nahi jaata “किया” jaata hain.